sanketshah | 30 April, 2008 12:27
में यहाँ राईस में आरकिटेक्चर का विद्यार्थी हुँ। आरकिटेक्चर का प्रोजेक्ट कभी
पुरा नहीं होता है और ये हमेशा ज़्यादा अच्छा हो सक्ते है और हमेशा समय की ज़रूरत
है। तो, “डेडलाइन” की पास मैं बहुत काम करता हुँ।
पुरी रात जागता हुँ, कभी कभी। जब मैं पुरी रात जागता हुँ, सवेरे नाश्ता करता हुँ, “सरवरी” में। और यह सवेरे में
पागल हो गया हुँ। लेकिन, अगले रात हमेशा सोता हुँ।
sanketshah | 30 April, 2008 12:10
में यहाँ राईस में आरकिटेक्चर का विद्यार्थी हुँ। तो, मैं आरकिटेक्चर का
विद्यार्थी का सोसाइटी में हुँ। और मैं सोसाइटी को सड़ा तीन हज़ार डोलर दिया था।
तो, हमारी शक्ति ज़्यादा हुई थी। हम
ज़्यादा कर सक्ते हैं। हमारा कारण है यह: विद्यार्थी और शिक्षको के बीचे बाते करना आसान। अब, ज़्यादा बार कुछ चीज़े करते है, इस लिए लोग
ज़्यादा बोलते हैं।
sanketshah | 30 April, 2008 11:17
इस पिछले हफ़्ते का आन्त लम्बा था। चार दिन था।
बुधवार को म़ैं और मेरे रूम्मैठो न्यु ब्रोनफ़ेलस तक गये। पहले दिन हम एक छोटे
मकान में रहे और बाहर हमे एक बङी आग बनाए।
मज़ेदार था, लेकिन मैंने मेरी ऊन्गली जलाई। दुसरा दिन हमे नदी में फ़लोट
करने गये। शान्ती था। फ़िर हम राईस को
वापस आये।
AparnaBhaduri | 29 April, 2008 13:14
मैं शराब नहीं समझती हूँ। मलुम है क्या है, और कौसा बनाता, और कौसे पीते भी हैं, लेकिन एकदम वहीं समझती क्यों। इतने लोग पीना रसन्द करते है, और सच है कि मैंने कभी नहीं शराब पी है, लेकिन नहीं मलुम है क्यों लोग मन उलटा करना चाहता है। अगर पीना मज़ेदार है, क्यों बीमार होते हैं। माज़ा कीना आसन है शराब बिना, और जब भी शराब है, लोग अगले दिन माज़ा चीजें भूल जाते हैं। शराब दूसरों के मन को बदासते हैं और यह मुझे डराता है। मैं डर रही हूँ क्योंकि जब लोग पिते हैं, दूसरे लोग बनते हैं, और अलग चीज़ें करते हैं। मेरे दोस्त नहीं डरते हैं, लेकिन अभी नहीं पिते है। मैं एक और चीज़ नहीं समझती हूँ, क्यों इतना डरती हूँ। बहुत लोग बीस सल के है, बहुत चालाक है, और अच्छे लोग हैं, लेकिन पिते हैं। उन्हें खुशी है, लेकिन मैं नहीं समझती हूँ और कभी नहीं कर सकती हूँ।
sanketshah | 29 April, 2008 11:07
आ- क्या हाल हैं?
ब- ठीक हैं।
भाई। और अप. अप कैसे हैं?
आ- मैं भी ठीक हुँ।
अग्ले हथफ़्ते आ रहा हुँ। आब मैं पद रहा हुँ। कल मेरी परीक्षा है। आपकी
परीक्षा हैं?
ब- जी। मेरी
परीक्षाएँ अगले हफ़ते है, नब तुम आ रहे हो।
आ- अच्छा। तेरे शिक्षके कैसे हैं?
ब- सब अच्छे हैं लेकिन एक शिक्षक ख़राब है। मोरी
फ़ोटो की शैक्षिक तूम्हे याद करती है।
आ – क्या
कह रही यी?
PradnyaBhawalkar | 29 April, 2008 01:05
मैंने हमारे समारोह के लिए एक गीत लिखा । यह गीत का नाम "जीवन का पेड़" है और इस के पीचे लिखा है।
जीवन का पेड़
१ यह है मेरे जीवन का पेड़
शायद आपका भी
और दूसरों का भी
ज़िन्दगी में अगर कुछ सचमच हुआ हो
मेरा पेड़ उन यादों का गवाह है
२ अभी देखो पेड़ के हाथ
उन के अन्दर क्या
जी रहा है?
सारी ज़िन्दगी कि अच्छी कहानियाँ, देखो देखो न
मेरी भी और आपकी भी,
ओ देखो देखो न
३ पञ्चतन्त्र के पांच तन्त्रे है
तो इस पेड़ को
कितने हाथ है?
पँचमी आई, हाँ हाँ, हाँ हाँ हाँ
आप है एकदम सही, पांच ही है।
४ पहला, दूसरा, तीसरा चौथा
पाँच हाथ हमारे
हम ड़रेंगे क्यों?
पहले खिलौने, दूसरा खाने, तीसरा पीने, और...
बच्चे, और उनकी गड़बड़ और ज़रुर थोड़ा प्यार
५ मरना जीना, खाना पीना
ये किस ने बनाया?
जो हम मानते है
जो भी चाहिए, जो भी चाहें, यह सिर्फ़ हमारा
जीवन है जो इस पेड़ ने देखा
गीत के लिए लिंक पर क्लिक करो:
BurtonMendonca | 28 April, 2008 18:38
करन एक गाँव में रहता है । वहाँ , वह बहुत ख़ुश है । हर दिन , वह मुस्कुराकर
उठता है । उसको मक्खन बहुत पसंद है और गाँव में , मक्खन ख़त्म नहीं होता है । करन
पहले काफ़ी मोटा था , मक्खन खाने की वजह से । अब , वह मोटा नहीं है क्योंकि वह
रोज़ खेलता है और खेत में काम करता है । एक साल में , करन शहर में यूमिवर्सिटी
जाएगा। वहाँ , वह बहुत नईं चीज़ें देखेगा और दूसरे लेगों से मिलेगा मगर अपना
प्यारा गाँव का मक्खन शहर में नहीं होगा ।
NickyMehtani | 28 April, 2008 16:24
यह हफ्ता हम अगला साल के क्लासेस के लिए रजिस्टर करो। वह थोरा सा मुश्किल था क्योंकि मुझे मालूम नहीं है कि मेरा मेजर क्या होगा। मैं सोचती हूँ के शायद मेरे दो मेजर होंगे, लेकिन वह आसन नहीं होगा। अब मैं सोचती हूँ के मुझको बिओकेमिस्ट्री और सोसिओलोजी पसंद हैं, लेकिन वे दो सुब्जेक्ट बहुत अलग हैं। इसलिए दो मेजर करना मुश्किल होगा क्योंकि बहुत क्लासेस रेकवैर्द हैं।
अब मुझे मालूम नहीं है कौंसी क्लासेस लुँगी अगले साल, लेकिन यह मालूम है के हिन्दी २०१ लुँगी!
ShradhaKulkarni | 28 April, 2008 11:57
कल मैं मन्दिर को गयी, लेकिन मैं सोचती हूँ कि मज़हब खरा और खोटा है| मेरा परिवार हिंदू है, तो जब मैं छोटी लड़की थी, मैं भी हिंदू थी| फिर एक दिन मेरे दोस्त ने कहा कि सब लोग न हिंदू न मुस्लिम न दुसरे मज़हब के है| ये सोचते हैं कि देव और देवी दुनिया में नहीं है| तो मैं इस के बारे में सोचने लगी कि कौन सही है| यह जवाब बहुत मुश्किल है क्योंकि मज़हब का प्रूफ़ नहीं है| अब मैं सोचती हूँ कि सब मज़हब एक वाक्य बोलते है कि अच्छे लोग बनो| हर मज़हब के अलग रास्ते है, लेकिन सारे रास्ते एक जगह को जाते हैं.
ShalinPatel | 28 April, 2008 00:33
RituRajan | 22 April, 2008 14:36
मेरी ज़िंदगी में बहुत चीजें ज़रूरी हैं| माता-पिता, दोस्त, खाना पीना, मज़ा -- वे सब मुझको चाहिए| लेकिन सारी चीजों से, मेरे लिए सब से ज्यादा ज़रूरी गीत है|
लोग पूछते हैं कभी कभी "अगर आपकी ज़िंदगी में सिर्फ़ एक चीज़ रखनी होगी तो, आप क्या रखेंगे?" इस प्रसन को मेरा जवाब बहुत आसान है| में सिर्फ़ मेरी आवाज़ रखूँगी क्योंकि गीत मेरी ज़िंदगी है|
हर दिन में गाती हूँ -- पैदल चलते, गाड़ी चलाते, काम करते करते में गाती रहती हूँ| बजपन से, मेरी सबसे बदा सपना है की में एक गाने वाली बनूंगी| लेकिन मैं क्या करूं? यह सिर्फ़ एक सपना है, न? ज़िंदगी मैं, ऐसे सपने के लिए वक़्त नहीं है| हमें शाला को जाकर पदना पड़ता है और बस| ऐसी है यह ज़िंदगी|
NealJain | 22 April, 2008 14:14
BurtonMendonca | 21 April, 2008 16:24
पिछले हफ़ते के अंत रविवार को , मैं मेरे दोस्त के साथ यूनिवर्सिटी में चल रहा था । एक आदमी हमारी ओर चल रहा था । हमारे आगे ठहरकर उसने एक बंदूक निकाली । उसने कहा ,” तुम्हारे वॉलेट दो जल्दी ! तुम जीना चाहते हो न ?” हमको बहुत डर लगा । मेरे दोस्त ने उसका वॉलेट निकाला । मौंने भी वॉलेट निकाला । तब , दो पुलिसवाले आए । उसके साथ दो बंदूक थीं । उन्होंने चोर से कहे ,” बंदूक नीचे रखो और हाथ ऊपर करो , धीरे-धीरे ।” पुलिसवालों ने चोर को पकड़कर हमारे वॉलेट हमको वापस दिए । हम बहुत नसीबवार थे कि पुलिसवालों ने हमको बचाया ।
DavidSorge | 20 April, 2008 16:11
सुनो रे बहरो!
बग़ीचे को सुनो!
आवाज़ पक्षी की
मौसम का नाच भी
एक साथ गाते थे।
देखो रे अँधो!
बग़ीचे में देखो!
भाई-भाई का ख़ून को
शराब के प्यालों में
ग़रीबो को बिकते है।
सोते हुए उठो!
बग़ीचे में जाओ!
वहाँ तुमसे मांगके
प्रभु तुमसे कहते हैं
“बग़ीचे में चलो रे
फिर से प्यार उगाएँगे।”
DarshanPatel | 18 April, 2008 20:51
हफ्ते के अंत को, मैं
घर गया. घर मे, मैं सोचा क्यों मुझको एक डॉक्टर
बनना चाहिए. मुझको एक प्लास्टिक सर्जन बनना चाहिए क्यों कि यह फील्ड बहुत वेर्सेतैल है. एक समर, मैं
मेरा चाचा का क्लिनिक गया. मेरा काका एक प्लास्टिक सर्जन है. उसके साथ, मैं ओ. र. गया.
मैंने बहुत दिलचस्प सुर्गेरिज़ देखे. एक आदमी का मुह मे कैंसर था. सर्जरी के बाद, उसका मुह मे कैंसर था. भिन्न केस, एक बच्चे का हात
एक ब्लेंदर मे गया. सर्जरी के बाद,
उसका हात नोर्मल था. पहले
से, ये लोगो उदास थे
क्यों कि उनके पास बहुत आशा नही था. लेकिन प्लास्टिक सर्जरी के बाद, इन लोग के पास आशा है. मुझको आशा है के एक दिन, मैं बी दूसरे
लोगों को आशा दूँगा.
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