SupriyaHattangadi | 25 March, 2008 02:02
ईस्तेरी अंडे को रंग देने का व्यवरण

१.
बाज़ार से कम से कम बारह अंडे और अंडे के लिए पैंट खरीदें.
२.
अंडे को उबालदें.
३.
पैंट
कि गोलिया को सिरका में डालें.
४.
अंडे पर क्रेयान से कुछ लिखें.
५.
अंडे को पैंट में गिरदें.
६.
कुछ वक्त के बाद,
अंडे को निकालदें.
७.
अंडे को सूखे होने दीजिए .
SupriyaHattangadi | 25 March, 2008 01:59
इस बसंत की अवकाश में, मैं मेक्सिको गयी. मेक्सिको में, मैं एक छोटा शहेर, जिसका नाम "सान मिगेल दे आयेंडे" था, में रह रही थी. मेरा सफ़र बहुत तबील नही था. दरअसल, मेरा सफ़र सिर्फ़ एक दो घंटे का था. जब मैं मेक्सिको पहुँची, तब एकाएक मुझे लगा कि मैं एक अंजान दुनिया में थी. मुझे हिन्दुस्तान का बहुत याद आया क्योंकि भारत कि तरह, लोग रस्ते पर खाना भेजते थे और सब बिल्डिंग्स बिल्कुल बदरंग नही थे. भारत के जैसे, बाज़ारें में टोलियाँ हैं, और वहाँ, मोल भाव करने एक ज़रूरत है.

marthafarnsworth | 23 March, 2008 14:32
गाड़ी से यात्रा करने का व्यवरण

AkritiRaju | 18 March, 2008 23:00
मोमबत्ती बनाने का व्यवरण
1। पुराने मोमबत्तीयों को तोडकर एक बडे कटोरी में डालो।
2। अगर आप चाहें तो अब इसमे रंग िमला सक्ते हो।
3। एक भरतन में पानी उबालो।
4। जब पािन उबाल रहा है, तब मोमबत्ती के कटोरी को भरतन में डालो तािक मोम नर्म हो सके।
5। मोमबत्ती िक बत्ती काट कर रिखये।
6। बत्ती के टुकडों को एक सुनदर गलास में डिलये।
7। अब गलास में मोम को धीरे से ढिलये।
8। जब मोम कड़ा हो जये, आप का मोमबत्ती तैयार!
PriyankaSen | 18 March, 2008 09:35
काग़ज़ की टोपी
१. एक आयताकार काग़ज़ लें और उसे आधे में मोड़ दीजिए ताकि चुनट ऊपर हो। चुनट डालने के बाद, काग़ज़ की चौड़ाई उसकी ऊंचाई से ज़्यादा होनी चाहिए।
२. ऊपर दाएँ कोने को अपने ओर खींचिए ताकि वो कोना नीचे आ जाए और पहली चुनट के मध्य में एक नया कोना बनाईए। ये दोबारा कीजिए लेकिन दूसरी बार आप बाएँ कोने को अपनी ओर खींचिए।
३. अगर आप ने अभी तक सही किया, तो काग़ज़ ऊपर में त्रिकोण होगा और उस के नीचे होगा दो आयताकार फ़्लैप्स। जो फ़्लैप आप की तरफ़ है, उसे ऊपर (अपनी मुँह की तरफ़) खींचिए और त्रिकोण कोने की तरफ़ मोड़कर चुनट डालिए।
४. आप काग़ज़ को पलटिए और दूसरी फ़्लैप से तीसरा स्टेप फिर से दोहराईए।
५. अब त्रिकोण के नीचे एक बड़ा जेब होगा जिस में आप अपनी उंगलीआँ डाल कर और खोल सकते हैं। खोलने के बाद, आप टोपी को सजा सकते हैं और उस के बाद उसे पहन भी सकते हैं।

MeghanJones | 17 March, 2008 16:48
PriyankaSen | 13 March, 2008 12:02
marthafarnsworth | 11 March, 2008 19:50
इस छुट्टी मैं देलरय समुद्र तट गयी मेरी दोस्तों और नानी देखने के लिए। यह मोहल्ला ऐत्लान्तिक महासागर के किनारियों पर होता हैं। विमान पत्तन में मैंने कोई समस्या नहीं मिला और हवाई जहाज न टाला। मेरे पहली कदम के साथ मुझे पता आया कि यह छुट्टी बहुत मज़ा होगा। मैं मेरी दो बचपन की दोस्तों को मिली फिर हम रेतीला समुद्र तट गयी। रेत पर बैटी हुई हम सिर्फ चर्च के जुटे रहने में संतोषी थी। एक अंजन अनुभव ने मुझ पर फैल लग रहा था – मेरे माथे से सलवट गिरा, मेरा सतर्कता घटा, और मैंने सारे मजारे भूल गये—शांति! मन में कुप्रथे के बजाय ख्वाबें आ रही थीं। शाम को दोस्त का घर पहुँचकर हमने बरसती में दावत पकाया और खाया। मैं सोचती हूँ कि हर वर्ष मुझे समन्दर जाना है।
AkritiRaju | 11 March, 2008 09:58
बसंत ऋतु की छुट्टीयों मे मैं एक क्रूज़ पर गिय, अपने रैस के दोस्तों के साथ। हम सीिनयोरस के िलये ये हुमरा आिखरी बसंत ऋतु िक छुट्टी है, और इस िलये बहुत अहम। हम सोमवार को गालवेसटन से रवाना हुये, प्रोग्रेसो, युकाटान के िलये। पेहले दो िदन हुम समुनदर पर यात्रा कर रहे थे और जहाज़ मे थे। मंगलवार को जहाज़ बहुत िहल रहा था और हुम हर थपकने पर ज़ोर से कराहते थे। हुमरा चाल मस्ताना था क्योंिक हुम सीधा चल नही पाते। उन िदनों के िलये हमे बहुत फ़ुरसत थी। हम खुब टाबू और ब,स, और बलेक-जेक खेले। रात मे हम जहाज़ के दरशन देखने गये। हमने किफ़ गुफ़्तगू िकये। और सबसे बुरा, हमने िनहयत खाया। जहाज़ पर एक 24-घंनटा िपज़्ज़िरया और आइस-क्रीम मशीन था। पेहले दो िदनो मे ही हम कफ़ी गोल-मतोल हो गये!

बुधवार को हम प्रोग्रेसो पर आमद हुए। यहान हम "िचचेन-इतज़ा" गये, जगत का एक अचंभा। यह जगह एक "मायन" मठ है, और देखने मे किफ़ कारगर। उसके बाद हम िफर जहाज़ पर रवाना हुए और गुरुवार को हम कोज़ुमेल पहुनचे। इस जगाह का परकर्ितक खुबसूरती मुझे बहुत अच्छा लगा। तीर का पिन बदरंग था और दूर से नीला लगा। हुम सब एक-एक पानी मे छलोंग करने लगे। पानी मे बहुत नमक था, लेिकन उसके िसवा, सबकुच दोषहीन था। मेरे खयालों से भी और खूबसूरत! हम पानी मे तैरने लगे और उसके बाद हम "कायाक" और "पाडल बोट" करने लगे। बहुत मज़ा अया, और िदन के आंत मे हम थक गये, और बच्चों के तरह सो गये।

शुक्रवार को हम िफर जहाज़ पर यात्रा कर रहे थे। हुम जहाज़ के "स्पा" मे गये, और हुमने "सौना" मे कफ़ी वकत िबताया। हुम पूरी तरह से आरम हो गये। शनीवार को हम गालवेसटन वापस पहुनचे।
बसंत ऋतु की छुट्टी बहुत मज़ेदार थे। मुझे जहाज़ मे जाने का आभास बहुत अच्छा लगा। मुझे ख्वािहश है के मेिर अगली चुट्टी भी इतनी अच्िछ होगी!
MeghanJones | 10 March, 2008 21:20
मैं अपनी मसरूफ़ बसंत ऋतु की छुट्टीयों पर पूर्वी तट को गयी. मतलब, मैं पूरी पूर्वी तट को गयी, दक्षिण से “केरी” में जहां मेरे माता-पिता रहते हैं, उत्तर को “बांस्तन” में जहां मैं “बांस्तन यूनिवर्सिटी” और “बांस्तन कांलैज” के वकील-बनना स्कूल को गयी. घर को, मैंने देखा मेरे माता-पिता, मेरा छोटा भाई (जो दरअसल इतना छोटा अभी क्योंकि वह बहुत लंबा है), मेरी बहिन, और मेरा बिल्ली, “स्मोकी.”
बांस्तन यूनिवर्सिटी का वकील-बनना स्कूल
और मैं “वेक फौरस्त” “विंस्तन-सेलम” में और “उत्तर केरोलाईना यूनिवर्सिटी” “चैपल-हिल” में को गयी. इस यात्रा के दौरान, मैं छह बार हवाई जहाज में थी, “नैशविल,” “बाल्तिमौर,” “फिलदेलफीय,” “रांली,” “प्रांविदेंस” और “ह्यूस्तन” को. मैं भी बहुत घंटे के लिये गाड़ी में थी. इन अलग आबहवे में मैंने “ती-शर्त” और जाड़े के कोट पहने. मैंने देखे बर्फ़, सूरज, और बारिश.
बदकिस्मती से, मैंने “नैशविल” में बर्फ़ नहीं कतरा, जहां मैं फंसी बे-शुमार, तबील घटे के लिये (दो-तीन, दरअसल) हवाई जहाज में. जब बार-बार हवाई जहाज de-iced था, मैंने बहुत बर्फ़ देखा, झरोखे में. मेरे हमराह के ख़्वाहिश हमारे आमद ह्यूस्तन में था. चंद को तैश लगता था.

मुद्दत के बाद, कोई हमराह के लिये, इंतज़ार करना बहुत दुर्लभ था (और मेरेलिये भी). लेकिन एक आदमी मुझके नज़दीक निर्दयी और खूंखार था! दूसरे हाथ पर, मैंने एक “यूनिवर्सिटी अफ़ पेन्सल्वेनीय” के छात्र से मिला. हम दो-तीन घंटे के लिये यूनिवर्सिटी, भविष्य के नक्षे, और ज़िंदगी ह्यूस्तन और फ़िलदेलफ़ीय में, और उत्तर केरोलाईना में के बारे में बात किया. यक़ीनन इस गुफ़्तगू के कारण, वह रात बिलकुल असहाय नहीं थी.
SupriyaHattangadi | 01 March, 2008 00:16
मेरे सबसे पसंदीदा ग्रह मंगल ग्रह है. मंगल ग्रह हमारे सबसे नज़दीक ग्रहहै. विकिपी़डीआ के अनुसार, सौर-संहति में, मंगल ग्रह चौथा ग्रह है. पृथ्वी से, मंगल ग्रह लाल दिखता है, और इसलिए लोग मंगल ग्रह को लालग्रह भी कहते है. मंगल ग्रह पर एक बहुत दुबला वायुमण्डल है, और दूसरेविषेह गुण भी है. उधारण -- मंगल ग्रह पर बहुत सारे चषक, आगनेगिरियाँ, छाटी, पहाड़, और मरुस्थल भी है.
पिछले छानबीन से यह पता चला कि शायद मंगल ग्रह में कभी पानी था. यह अनुसंधान बहुत अहम है क्योंकि अगर यह सच है, तो शायद लोगोंमंगल ग्रह पर जी सकते है. सोचों: ज़िंदगी कैसा होगी अगर हम सब पृथ्वीके जगह में मंगल ग्रह पर रहते!

PriyankaSen | 28 February, 2008 09:38
मेरा सबसे पसंदीदा ग्रह वही है जिस की निवासी हूँ मैं - पृथ्वी। मेरी वैञानिक जानकारी के मुतलिक पुरी अंतरिक्ष में ये केवल एक ऐसी जगह है जहाँ जीवन है, जहाँ पानी की लहर बहती है और हमें साँस लेने के लिए आक्सीजन मिलती है। यहाँ हर तरह की शैल प्रदेश (बीहड़) है - गहरा समुदंर, ऊँचे पर्बत, मरुभूमी, घने जंगल, इत्यदि। पृथ्वी के हर कोने में जीविका है। और सबसे अहम बात यह है कि पृथ्वी मेरा घर है। हमें इतना सब कुछ देने के बाद, भला कोई दूसरा ग्रह के बारे में कैसे सोच सकता है?

AkritiRaju | 27 February, 2008 17:32
मेरे सबसे पसनदीदा ग्रह शनी ग्रह है। कयों? कयी करन है मेरे चुनाव के िलये। पेहले, यह ग्रह सबसे स्पष्ट है कयोंिक इसके अपने वलय हैं। इन वलयों के व्जय से हुम शनी को फ़ोरन पेहचान सकते हैं। शनी सुरज से छठवा ग्रह है, और द्वितया बडा ग्रह। गुरु सबसे बडा ग्रह है। शनी एक वायु ग्रह है, कयोंिक यह ज़यदातर वायु से बना है, पत्थर से नही। इस्के वलयें बरफ़ के मूल कण और धूल से बने हैं। वलयों के बीच ज़यादा छेद नही है, और वे शनी के चमक को बढाते हैं। शनी के अपने साठ चाँद हैं और 'टैटन' सबसे बडा चाँद है। टैटन इतना बडा है, िक यह बुध ग्रह से भी बडा है।

इस ग्रह का नाम रोमन देवगाता के देव 'सटरनस' से आता है। यह देव उपज और खेित-बाडी के देवता हैं। िहंदू जयोत्शी में शनी ग्रह नवग्रहों मे न्यायधीश है। यह ग्रह सुरज का बेटा माना जाता है। शनी शासन करता है िक अच्छे या बुरे कर्म होते हैं।

यह सब मेरे करन है, िजस वज्य से मुझे शनी ग्रह सबसे पसनदीदा है। मेरा सबसे प्यारा करन है िक शनी ग्रह से शनीवार आता है, और मुझे यह िदन भी बहुत पसंद है!
MeghanJones | 26 February, 2008 17:47
विकीपीदिय (Wikipedia) के अनुसार, शनि ग्रह या वरुण ग्रह मेरा
ज्योतिषी कुण्डली का प्रबल ग्रह हैं लेकिन मेरा सब से पसंदीदा ग्रह बुध ग्रह है.
मुझे बुध ग्रह पसंद है क्योंकि सब से छोटा ग्रह है और इसको बहुत दिलचुस्प देवगाथा है.
पूराने रोम के लोगों ने इस ग्रह को नाम दिया (मर्क्यरीयस). रोम का देवता
मर्क्यरीयस यूनानी देवता हर्मीज़ से आता है. हर्मीज़ के पास उदात्त जूते थे और
उसका नौकरी हरकारा देवते और इनसान के बीच था. बुध ग्रह सब से जल्दी ग्रह है
क्योंकि सिर्फ़ 88 दिन उसके ग्रहपथ में है.
marthafarnsworth | 23 February, 2008 12:20
प्रय दैनिकी,
आज मैं मराक्को के अन्दर में हूँ। बहुत समय नाव से चलाकर मैं स्पैन से मराक्को
का किनारा पहुँच गयी। फिर मैं यहाँ तक बस से आयी। चूँकी यहाँ मौसम ज़्यादा गरम है,
मैं पसीने में डूबी हुई और मैं गंदी हूँ। अभी मैं कछ दिनों के लिए मैरकेश में रहती
हूँ ।
मैरकेश एक जगह है जिस में मैं कुछ हुक्का (या हब्ली-बब्ली) पीना कोशिश करूँगी। हर
रोज़ मैं और मेरी दोस्त उठकर एक-दो कप पुदीनी चाई, जो ख़ास मदिरा मराक्को का है,
पीती हैं। कल हम ने बहुत कुबसुरत कुतूबीआ मस्जिद देखा। शायद कुछ दिनों के बाद हम
थार के अंदर चालें। अगर हम जाएँ, तो हमें ऊंटों पर जाना है क्योंकि मुझे ऊंट और
ऊंटनी बहुत पसंद हैं। और मुझे लगता है कि ऊंट वे पशु हैं जो अजीब से अजीब चाल से
चलते हैं, और जब वे उठ रहे हैं, फिर उनको गिरना लगता है। पिछले साल मैं अपनी छुट्टी के लिए लन्दन गयी, लेकिन
मराक्को लन्दन से और दिलचस्प है।
आपकी,
मार्था
SupriyaHattangadi | 21 February, 2008 19:37
टीन साल पहले, मैं हिन्दुस्तान गयी थी. जब मैं वाहा गयी, तब मैं दो हफ्ते गोआ में कुछ वक्त बिताई. मुझे गोआ बहुत पसंद आया, और मैं जल्दी वापस जाना चाहती हूँ. गोआ भारत के पस्छिमि समुद्र तट पर है.

(More)
PriyankaSen | 21 February, 2008 14:14
बात दस साल पहले की है। मैं और मेरा परिवार का सफ़र शुरू हुआ कोलकाता से जहाँ हम गर्मी और उमस से छुटकारा पाने के लिए हमने तय किया कि हम पहाड़ों की रानी, दार्जलिगं, छुट्टियाँ मनाने के लिए जाएंगे। जब हम शीआल्दा के त्रेन स्टेशन में पहुंचे तो हमें पता चला कि जिस गाड़ी से हमें रवाना होना था, वो त्रेन कैन्सल हो गई थी। शायद मैं ज़िन्दगी में कभी नहीं भूल पाऊंगी कैसे मेरे छोटे छः साल के भाई के चहरे की रगंत बिलकुल फीकी पड़ गई थी जब उसे पता चला कि त्रेन नहीं आएगी - दो बड़े आँखों से मोटे-मोटे आँसू छलक रहे थे और होंठ फूल रहा था। हमें हर हाल में दार्जलिगं पहुंचना ही था।
इसलिए, हमें डेढ़ दिन बस में सफ़र करना पड़ा। सारी रात हम ने बस में बिताया और जब सुबह आँख खुली तो मुझे एहसास हुआ कि हम कोलकाता शहर की भीड़-भाड़ से बहुत दूर जा चुके थे। खिड़की से बाहर झाँका तो बहुत हरियाली दिखाई दी।

चाय का बागान
चारों ओर था सनोबर के पेड़ और चाय का बागान। हम शिलीगुड़ी पहुंच गए थे और बस का सफ़र ख़त्म हुआ था। शिलीगुड़ी से हमने दो ड्राईवेर किराए पर लिए और उनके टाटा सूमो में बैठ कर दर्जलिगं के लिए रवाना हो गए।
इतनी हरियाली और पहाड़ मैंने इससे पहले सिर्फ़ एक दो बार ही देखा था जब मैं और भी छोटी थी, करीब पाँच या छः साल की, जब हम सब रानीखेत, जिम कॉर्बेट पार्क, नैनिताल, भीमताल, मुक्तेश्वर, और वैश्नो देवी का मंदिर देखने के लिए गए थे। तब मैं इतनी छोटी थी कि छोटी-छोटी बात मुझे अब याद नहीं है। लेकिन इस बार मुझे वो हर एक बात याद है - कैसे मेरे कान बंद हो रहे थे पहाड़ के ऊपर चढ़ते समय, कैसे मैं डर रही थी हर एक टेढ़ी-मेढ़ी पहाड़ी रास्ते के मोड़ में के हम खाई में गिर के तिस्ता नदी के तेज़ रफ़्तार की लहर में बह जाएंगे।
तिस्ता नदी के तेज़ रफ़्तार की लहर
जगह जगह पर हम चाय बागान देखने उतरे लेकिन मैं वहाँ के वातावरण से परिचित न थी। इसलिए, जब मैं लौट कर गाड़ी में आई, तब अचानक मैंने देखा मेरे पाँव पर कुछ काला सा चिपका हुआ था। मैंने घबरा कर मामा से पूछा ये क्या है। तब गाड़ी में सब हंस पड़े और कहा ये जौंक है। फिर उस पर थोड़ा सा नमक छिड़ककर निकाला।
लेकिन यह छोटी तक़्लीफ़ें उस जगह की प्राकृतिक सौंदर्यता को ढक नहीं पाई। वो ठंडी हवाएं जो श्वसन को और मज़ेदार बनाता है और सब को फिर जवान कर देता है और वह कुहासा जो गाड़ी की खिड़कियाँ खोलने पर अंदर आ गई थी, यह भी याद है। और क्योंकि गाड़ी में हम चार बच्चे थे, हमें हर तीन घंटे में रुक कर रास्ते के किनारे पर ढाबों में खाना पड़ता था चाहे वो पूरी भोजन हो या सिकी हुई मक्की या वहाँ के ख़ासियत, मोमो, जो असल में एक डंप्लिंग है। जैसे हम ऊपर चढ़ते गए, वैसे क्रमशः ठडं बढ़ती गई।

क्योंकि हम जून में यात्रा कर रहे थे, हमें जगह जगह पर बारिश मिली और जब हम दार्जलिंग पहुंचे तो मेघ छाई हुई थी। हम दार्जलिंग की एक लॉज में तीन दिन रहे। क्योंकि पूर्व में सूरज बहुत जल्दी उठता है और जल्दी ढल भी जाता है, हमारा दिन चार बजे शुरू होता था, बड़ों के लिए गरमागरम दार्जलिंग चाय से और हम बच्चों के लिए गरम दूध से।
पहले दिन हम घूम वानप्रस्थाश्रम गए जहाँ पे करीब बीस बालिक थे जो बहुत एकाग्रता के साथ बौद्ध मंत्र पढ़ रहे थे और याद रखने की कोशिश कर रहे थे।


घूम वानप्रस्थाश्रम
बच्चे तो मेरे उम्र या मेरे से कम उम्र के थे, लेकिन उनकी अर्पण और तपस्वी ज़िन्दगी के आगे और कुछ नहीं दिखाई दिया। शायद उन बच्चों में से अगले दलाई लामा चुने जाएंगे!
द्वितीय दिन, हम सुबह दो बजे उठ कर टाईगर हिल के लिए निकले। अगर आप भाग्यवान हैं और ऐसे दिन जा सकते हैं जब आकाश स्पष्ट हो, तो सूरज की पहली किरण से आप एवरेस्ट का शिखर देख पाएंगे। लेकिन, अफ़्सोस वश के जब हम गए, तब एवरेस्ट मेघ से ढकी थी और सूरज के अलावा और कुछ नहीं दिखाई दिया। टाईगर हिल के निराशा के बाद हम दार्जलिंग के नामवर जीवादि वाटिका में गए। वहाँ के शाईबीरीअन बाग देखकर हम सब का दिल बहल गया। पूरे हिन्दुस्तान में यही सिर्फ़ एक जगह है जहाँ इस जानवर को रखा गया है।
तृतीय दिन बड़ों ने सिर्फ़ आराम करने के लिए रखा था। दो दिन दार्जलिंग में रहे थे लेकिन पर्बतों का कोई निशान भी नहीं था। उस दिन मुझे याद है कि मैं अपने ममेरे भाई के साथ दुकान घूमने गई थी। हाथ से कुछ फिसलगया था और जब मैं वह चीज़ उठाकर खड़े होने की कोशिश की तो मेरी नज़र आकाशवृत की ओर चली गई और मैं मुग्ध रह गई ... वहाँ था वो दृष्य जो मैं कई दिनों से देखने के लिए तरस रही थी। सारे मेघ हट चुके थे और नीले आकाश में था काँचंजुंगा का पर्बत श्रंखला, और भारत का सबसे ऊँचा शिखर!

काँचंजुंगा का पर्बत श्रंखला
मैं आधे घंटे तक देखते ही रह गई और इस प्राकृतिक सौंदर्यता को तर करती रही। जितनी जल्दी मेघ हट चुके थे, उससे भी जल्दी बादल फिर छा गए और पर्बतों को किसी राज़ की तरह छुपा दिए। आख़िर में मेरा यात्रा सफ़ल रहा। ये शायद मेरे जीवन का सबसे यादगार सफ़र रहा।
AkritiRaju | 21 February, 2008 13:44
िपछले गरिमयों में मैं अपने परीवार के साथ "लेक ताहो" गयी थी। यह झील कािलफ़ोरिनया और नवाडा में है। मुझे यह छुट्टी बहुत अछी तरह से याद है कयोंिक यह भुमी में गगन के तरह है। मेरे खयलों मे यह सबसे खुबसूरत जगह है। जहाँ देखो, वहाँ हीरे पेड, नीला पानी, और गाती िचिड़या थे। झील का पानी एक बडा नीलम मणी जैसे थी। यहाँ अदमी सच-मुच प्रकृती के साथ एक हो जाता है।
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पेहले िदन, हुम होतेल के बाहर गूमने गये। हुम झील के पास पैदल गये और हमारे पाँव गीले हो गये। हम रेत मे लेट गये और धूप का मज़ा िलया।

अगले िदन हम पानी में "जेट स्की" करने गये। यह चीज़ बहुत मज़ेदार है! मैं अपने िपता-जी के साथ पेहले गयी और िफर अपने आप। बाल हवा मे जब उडती थो बहुत अच्छा लगता। पानी बहुत टनडी थी लेिकन जब छाल में पडता थो मैं उछल पडती। मेरे सारे क्षट उन पल के िलये चले गये।
उसके बाद हुम कसीनो देखने गये। क्योंकी रीनो लास वेगस के पास है, वहाँ काफ़ी कसीनो है। हुम थोडी देर के िलये एक कसीनो के अनदर गये, लेिकन बहुत से लोग फ़ूंक रहे थे, थो हुम िनकल गये।
आखरी िदन हुमने खरीदारी की, दोसतों और पिरवार के िलये। मैने अपने रैस के दोसतों के िलये "शोट गलास" खरीदी। मेरे माता और मैने हुमरे िलये सुनदर थैिलयं खिरिद।

छुट्टी बहुत अच्छी थी और पूरे पिरवार को बहुत मज़ा अया!
MeghanJones | 20 February, 2008 23:13
िछली जाड़े का छुट्टियों को मैंने अपने माता-पिता के घर को वापस किया. उनका घर "केरी, नांर्थ केरोलाईना" में है. शायद कोई लोग सोचते हैं कि "केरी, नांर्थ केरोलाईना" अच्छा यात्रा वृत्तांत नहीं है, लेकिन मेरे माता-पिता का घर मुझे बहुत असामान्य हो गयी है. राईस यूनिवर्सिटी एक हज़ार माईल्ज़ दूर घर से है. और हर बार जो मैं घर को वापस करती हूं,
मुलाकात यात्रा वृत्तांत बनाता है.
(More)AmiChheda | 20 February, 2008 10:14
इन गरमियों में मैं एक study abroad के आपस के साथ स्पैन गयी। माड्रिड पहला स्थान था कि हम यात्र किए। माड्रिड की लोग को अम्रीकी लोग पसंद नहीं आते हैं। खाना एकदम बराबर नहीं थी जैसे मैं मानती थी, लेकिन शहर बहुत सुंदर और साफ था। बहुत प्लाजा थे और इस रहने के तरह मुझको बहुत अच्छे लगे।
माड्रिड के बाद, मेरे आपस और मैं valle de los caídos को गए। वहाँ बहुत सुंदर scenery था, और यह यादगार स्पैनिश सरकार नहीं बदलेंगे। उसके बाद, हम el escorial गए। वहाँ एक पूराना और सुंदर monastery देखे। दिन के अंत में हम टोलेडो गए और वो बहुत एकमात्त था। पूरी शहर एक पहाडी पर है, फोर्ट जैसे है। रास्ते पत्तर से थे और हम पता गए कि टोलेडो कि लोग ज्यादा बूढा है।
तब हम बार्सलोना गए। बार्सलोना में मैं चार हफ्ते के लिए रही। मैं एक señora और उनकी बेटी के साथ रही। मैं Pompeu Fabra Universitat में क्लास ले। हर दिन मैं बीच में ले़टी मित्र के साथ और बहुत साँवला बन हुई। हफ्ते के अंत में छोटे यात्रे किए।
पहते हफ्ते के अंत में हम कोस्ता ब्रावा गए। वह एक quiant शहर-गाँव था जहाँ बाशा स्पैनिश और फ्रांसीसी से मिला था। वहाँ हम Salvador Dalí की घर देखे।
अगले हफ्ते के अंत में हम रोम गए। उसका खाना heavenly था। बहुत खाई। इटालियन लोग बोले जैसे stereotype कहते है। मेंने कालसियम, पान्तियोन और सैंट पीटर बासिलिका दैखा।
सब के बाद, मैं इबीजा गयी। बहुत बहुत सुंदर था। छोटा-सा टापू था और प्रिय स्थाम लेकिन commercialized नहीं था। क्लब्स बहुत महंगी थे, काफी 50 euros सिर्फ अंदर को जाने के लिए। मेरा प्यारा जगह था। बीच फेक लगते थे, पानी बहुत नीली और मेधशन्य थी।
जब मुझे रवाना होना पडते थे, में बहुत दूःखी थी। में वापस जाना चाहती हूँ। एक दिन में बार्सलोना में रहूँगी।
MeghanJones | 14 February, 2008 14:12
SupriyaHattangadi | 14 February, 2008 11:40
PriyankaSen | 14 February, 2008 00:05
इलीश सरसों बाटा
(बंगाली तरीके की मछ्ली)
३ व्यक्तियों के लिए
कुकिंग समय २५-३० मिनट
सामग्री:
२ पाउंड हिल्सा मछ्ली (मोटे तुकड़ों में कटी हुई)
१ १/२ छोटा चम्मच नमक (स्वाद अनुसार)
३/४ छोटा चम्मच हल्दी
२ बड़े चम्मच सरसों के दाने
६ हरी मिर्च (३ साबुत, ३ चिरी हुई)
१/२ प्याला पानी
२ छोटे चम्मच दही
४ बड़े चम्मच सरसों का तेल
विधी:
१. मछ्ली पर नमक और हल्दी अच्छी तरह मिलाईए।
२. सरसों और हरी मिर्च में थोड़ा पानी डालकर पेस्ट बनाईए और इस को छान ली जिए। छ्नी हुई पेस्ट को दही के साथ अच्छी तरह से फेंट ली जिए।
३. एक पतीले में तेल गरम की जिए। फिर मछ्ली एवं सरसों का मिश्रण हलके हाथों से इस में डाल दी जिए। इस के ऊपर चिरी हुई हरी मिर्च, शेष पानी और शेष तेल डालिए।
४. फिर एक बड़े भगोने में थोड़ा पानी डालकर पतीले को उस के अंदर बिठाईए। एक बड़े ढक्कन से दोनों बरतनों को ढक दी जिए।
५. इस को २५-३० मिनट मध्यम आंच पर खौलने दी जिए।
६. ढक्कन खोलकर गरमागरम परोसिए।

AkritiRaju | 12 February, 2008 17:07
िखचडी

आवश्यक सामग्री
एक कप चावल
आधा कप मूँग की दाल
3-4 लौंग
एक 1/4" टुक्डा दालचीनी
6-7 काली िमर्च
एक तेजपत्ता
एक छोटा चम्मच जीरा
2-3 छोटे चम्मच घी
नमक स्वादानुसार
विधि
1। चावल और दाल को पानी में बीस मीनट िभगो के रख लें।
2। एक पतीले में घी गरम करले, उसमें जीरा, काली िमर्च, तेजपत्ता, लौंग और दालचीनी डालकर भूनलें।
3। िफ़र चावल और दाल में से पानी िनकालकर उसे िमलादें और दो-तीन मीनट तक भूनलें।
4। िफ़र पाँच कप पानी और स्वादानुसार नमक िमला लें और धीमे आँच पर पकलें।
5। अचार, पापड और सालाड के साथ गर्मा-गर्म परोसे!

marthafarnsworth | 10 February, 2008 20:20
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