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"चुपके चुपके": एक समीक्षा

VatsalaGoyal | 11 October, 2008 17:09

धर्मेन्द्र की फ़िल्म "चुपके चुपके" मेरी सबसे मनपसंद फिल्मों में से है. मैंने यह फ़िल्म करीबन पचास बार देख रख्खी है, लेकिन फिर भी उसे देखने का मज़ा नहीं गया. इस की कहानी थोड़ी टेढ़ी-मेढ़ी है - एक बौट्नी का प्रोफ़ेसर (धर्मेन्द्र) एक ख़ूबसूरत लड़की (शर्मीला टैगोर) से शादी करता है, और उसके म्हू से अपने जीजाजी की बुद्धी की तारीफें सुन सुन कर थक जाता है. जब जीजाजी एक "वाहनचालक" (मतलब ड्राईवर) की मांग करते हैं, तो धर्मेन्द्र एक ड्राईवर के रूप में उनके घर पहुँच जाता है. जीजाजी सिर्फ़ श्रुध हिन्दी बोलने की ज़िद करते हैं, तो धर्मेन्द्र उन्हें सताने के लिए श्रुध हिन्दी में उन्से भी आगे निकल जाता है. जब धर्मेन्द्र की पत्नी अपने माय्के आती  है तो साथ में एक नकली पती को ले आती है, जो सच में धर्मेन्द्र का दोस्त है. उसके जीजाजी और घर में सभी नकली पती को असली पती मानते हैं, तो जब वह लोग शर्मीला टैगोर और अपने ड्राईवर के बीच प्यार की निशानियाँ देखते हैं तो उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आता. ऊपर से नकली पती वहीं पे किसी लड़की के प्यार के चक्कर में फंस जाता है, और कहानी ऐसे ही मोड़ पर मोड़ लेती रहती है.

 

मुझे यह फ़िल्म इतनी पसंद है क्यूँ कि इसकी कहानी बहुत नई है; मेरे ख्याल में आज तक इतनी अच्छी टेढ़ी मेढ़ी कहानी बॉलीवुड में फिरसे नहीं बनाई गई. और इस में जो कॉमेडी है वह बहुत साधारण तरीके से पेश की गई है, लेकिन कहानी इतनी पागल है कि समझ में नहीं आता कि उसे सच्चा मानें या सिर्फ़ एक कहानी. इस फ़िल्म के dialogues तीस साल बाद भी कानों में गूंजते हैं - उनकी तो बात ही कुछ और है!

 

अगर आप ने अभी तक "चुपके चुपके" नहीं देखी है तो जल्दी से जल्दी देखिये! मेरा वादा है कि आप हंस हंस के पागल हो जायेंगे =) (लेकिन आशा है कि पागल होके आप अपने आप को खुदा समझना नहीं शुरू करदेंगे...=])

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